श्री गुरुजी

दंडवत प्रणाम । जय बंसीवाले की
"परिमल"
"परिमल मासिक पत्रिका" का जन्म सन् 1982 हुआ था। इस पत्रिका के जन्मदाता मुख्य कर्ता धर्ता स्वयं संपादक कै. प. पू. प. म. श्री मुकुंदराज बाबा पंजाबी उर्फ कै. प. पू. प. म. श्री परिमल वाले बाबाजी है | बाबाजी का जन्म सन् 1938 मे गांव "चिड़ावद " जिला देवास (मध्य प्रदेश) मे हुआ। बचपन से ही धर्म-भक्ती, पूजा-पाठ के प्रति लगाव हो गया तथा गांव के श्री दत्त मंदिर मे नियमानुसार प्रात जाने लगे। वहां श्री दत्त मंदिर के प.पू. श्री बाबाजी की प्रेरणा से श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ भी लगन से करने लगे। धीरे-धीरे समय बीतता गया और 21 वर्ष की आयु मे संसार के प्रति वैराग्य धारण कर लिया, तथा आत्म-कल्याण हेतू जीवन परमात्मा की भक्ति मे लगाने का निश्चय कर लिया और एक दिन अपना सर्वत्र त्याग कर गांव से बिना किसी को बताये निकल
गये।
कुछ निश्चित नही था की कहा जाना है, परंतु किसी हितचिंतक ने बताया कि महाराष्ट्र, नवसारी मे प. पू. प. म. श्री ऋषिराज बाबा जी पंजाबी उर्फ श्री मुरारीमल्ल बाबाजी के पास जाओ। वह वहां पहुंचे तो वहां श्री बाबा जी स्वयं और भी पू० संत महंत विद्यमान थे। सब ने इनकी परीक्षा ली, प्रश्न पूछे और उत्तर सुनकर सब को तसल्ली हो गई कि यह इस ईश्वर मार्ग मे सन्यास दीक्षा ग्रहण करने के योग्य है और अगले ही दिन तिथि 3 जनवरी को प. पू. श्री परिमल वाले बाबा जी की सन्यास दीक्षा विधिपूर्वक प.पू. प. म. श्री ऋषिराज बाबाजी पंजाबी द्वारा संपूर्ण हुई। पूजनीय श्री गुरुजी का नाम म० श्री मुकुंदराज पंजाबी रखा गया तदोपरांत पूजनीय श्री गुरुजी, पूजनीय श्री बाबा जी के सानिध्य में रहने लगे तथा पूजनीय श्री बाबा जी की सेवा में पूर्ण श्रद्धा पूर्वक, लगन से जुट गए। सेवा से जो समय मिलता उसमें शास्त्र अध्ययन, अभ्यास करते।
कुछ वर्ष बाद पूजनीय श्री बाबा जी ने श्री गुरुजी को कहा कि सब यहां महाराष्ट्र में रहेंगे तो उत्तर भारत की तरफ धर्म प्रचार कौन करेगा? थोड़ा इस विषय विचार करो और कुछ करो। " अपने पूजनीय श्री बाबाजी की आज्ञा मानकर पूजनीय श्री गुरुजी यहां पंजाब आ गए तथा मंदिर / आश्रम हेतु जमीन देखने लगे। कुछ समय उपरांत चंडीगढ़ में किसी ने अपने खेत की जमीन दान की, जहां पूजनीय श्री गुरुजी ने मंदिर / आश्रम का निर्माण कार्य शुरू किया। जमीन निर्माण के लिए भी पूजनीय श्री गुरुजी का काफी समय, अथक परिश्रम एवं कष्टों में व्यतीत हुआ, परंतु ईश्वर ने और पू. श्री बाबाजी की आज्ञा रूपी प्रसन्नता श्री गुरुजी को बहुत सहायता एवं हिम्मत प्रदान की। धीरे-धीरे क्रमानुसार मंदिर / आश्रम का कार्य सुचारु रुप से चलता गया एवं इस मंदिर / आश्रम का नाम "विशाल श्री गीता भवन" रखा गया जो चंडीगढ़ सैक्टर-52 में स्थित है।
कुछ समय उपरांत सन् 1982 में पू. श्री गुरुजी के प. पू. श्री गुरुजी ने उनसे कहा कि "आजकल समय बदल गया है, पत्रिका का चलन है तो क्यों ना हिंदी पत्रिका के माध्यम से धर्म का प्रचार कार्य किया जाए ।" तो पू. श्री गुरुजी ने कहा कि "हो सकता है, अच्छा विचार है पर करेगा कौन? लिखेगा कौन? कैसे होगा?" तो उनके प.पू.श्री गुरु जी की वाणी से निकला, "शुरू तो करो सब हो जाएगा ऐसा दो बार उन्होंने कहा, मानो दिल से आशीर्वाद दे रहे हो। अपने प. पू. श्री गुरुजी की आज्ञा और इच्छा मानकर पूजनीय श्री गुरुजी ने यह सेवा भी अपने कंधों पर ले ली तथा तन मन धन से इस पत्रिका को आरंभ करने हेतु व्यवस्था में पूर्ण लगन से जुट गए। एक बार फिर ईश्वर कृपा, गुरु प्रसन्नता रंग लाई और धर्म प्रचार हेतु एक मासिक पत्रिका का जन्म हुआ जिसे आज
हिंदी परिमल मासिक पत्रिका
के नाम से जानते हैं। इस पत्रिका को आरंभ करने में बहुत रुकावटें आई, कभी लेख को लेकर, कभी खर्च यानी धन को लेकर, डाक घर की कार्रवाई, भक्त जनता के पते आदि, परंतु पू. श्री गुरुजी की लगन, अथक परिश्रम, ज्ञान, मनोबल, बुद्धि, विवेक सबके मिश्रण ने इस सपने को साकार कर दिखलाया और बहुत ही सुंदर आरंभ हुआ।
पहली 'परिमल' पत्रिका में इतने सुंदर ज्ञान से परिपूर्ण लेख छपे की भक्त जनता के मन में ऐसा उत्साह, प्रेम, हर्ष पत्रिका को पढ़कर कि आज तक उनके मन से 'परिमल' रूपी सुगंध जा नहीं पा रही। बस फिर कुछ ही महीनों में ही भक्त जनता को इस "परिमल" पत्रिका से इतना ज्ञान प्राप्त होने लगा एवं पढ़ने में रस आने लगा, जिसका मानो, वह कब से ऐसे सुंदर हिंदी लेखों की प्रतीक्षा कर रहे हो। भक्त जनता के पत्र आने लगे कि हमें आज तक इतना ज्ञान कभी प्राप्त नहीं हुआ, वह भी इतनी सरल हिंदी भाषा में, आप इस पत्रिका को कभी बंद मत कीजिएगा, चाहे कुछ भी हो जाय। "परिमल" पत्रिका के लिए नाममात्र चंदा तय किया गया, जिससे पत्रिका हर महीने नियमित एवं सुचारु रूप से चलती रहे, परंतु कभी भी चंदा पूरा नहीं आया और ना समय पर आया। जिसके चलते "परिमल" चलाने में बहुत कठिनाई होती थी, परंतु पू. श्री गुरुजी ने 'परिमल' पत्रिका कभी चंदे या धन के अभाव में बंद नहीं की और निश्चय किया कि चाहे कोई चंदा दे या ना दे, यह "परिमल" मेरे जीते जी, जब तक मेरे में शक्ति है, मैं बंद नहीं होने दूंगा। ईश्वर कृपा, गुरु प्रसन्नता से सन् १९८२ से लगभग ३५-४० वर्ष "परिमल" ऐसे चली कि फिर रुकी नहीं। भक्त जनता को इतनी असक्ति हो गई कि महीना होते ही घर के दरवाजे पर "परिमल" का इंतजार ऐसे करते थे जैसे किसी अपने प्रिय बंधु ने आना हो । 'परिमल' पत्रिका धीरे-धीरे लगभग पूरेश्री गुरुजी
ने आना हो परमल पत्रिका धीरे-धीरे लगभग पूरे भारतवर्ष में लगभग सभी राज्यों में डाक द्वारा भेजी जाती थी जिसकी संख्या ४००० से ५००० तक थी। 'परिमल' पत्रिका पढ़कर कई भक्त नाम धारक बने, कई नाम धारक से वासनिक बने, कर्ड वासनियों ने सन्यास दीक्षा ग्रहण की इस 'परिमल' पत्रिका की एवं इसके जन्मदाता परम पूजनीय श्री गुरुजी की जितनी महिमा गाये, उतनी कम है और न ही इन हाथों में इतनी शक्ति है कि कुछ लिख सके, ना वाणी में इतनी शक्ति कि कुछ वर्णन कर सकें। "परिमल" पत्रिका नियमित रूप से २०१२ तक चलती रही, परंतु "कोरोना बीमारी के चलते, सब डाक सेवा बंद होने से, पत्रिका को मजबूरी में बंद करना पड़ा। तत्पश्चात पू. श्री गुरुजी का स्वास्थ्य ठीक ना रहने से भी बाद में 'परिमल' पत्रिका पुनः आरंभ ना हो पाई। फिर दिनांक ९ दिसंबर २०२१ को हम सब पर दुखों का अंबर गिर पड़ा और हम सबके परम पूजनीय प्रिय श्रीगुरु जी की देवाज्ञा हो गई। वह सबको दुखः वियोग में छोड़कर सदा के लिए देह त्यागकर चले गए। इससे पूरे महानुभाव पंथ, जय कृष्ण संप्रदाय को बहुत भारी क्षति पहुंची। खासतौर पर उत्तर भारत दिल्ली, पंजाब, जम्मू, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश आदि यहां की भक्त जनता को सबसे ज्यादा क्षति हुई क्योंकि, यदि सत्य कहे तो उत्तर भारत के धर्म का आधार हमारे पूजनीय श्री परिमल वाले बाबा जी ही थे। यह अतिशयोक्ति नही होगी, यदि हम यह कहे कि उत्तर भारत में जय कृष्ण धर्म की रीड की हड्डी पू. श्री परिमल वाले बाबाजी थे। चाहे 'विशाल श्री गीता
भवन' से धर्म प्रचार किया, 'परिमल' हिंदी मासिक पत्रिका द्वारा किया, उन्होंने स्वयं जगह-जगह जाकर अपनी सुंदर-सरल भाषा द्वारा, ज्ञान प्रवचन देकर धर्म प्रचार किया। घरों घरों में जाकर अनेक भक्त जनता को धर्म का ज्ञान करवाया, विधियां घड़दाई, धर्म पर दृढ़ किया। गांव-गांव, शहर-शहर, धार्मिक सभाओं में जाकर अपने प्रवचनों द्वारा अनेकों के धर्म आधार बने प.पू. श्री गुरुजी तो हम सब को छोड़ कर चले गए, परंतु उनकी स्मृतियां, उनका स्नेह, उनकी प्रसन्नता, उनके उपदेश, उनकी शिक्षाएं, उनका अनुभव सदेव जीवित रहेगा और हम सबको मिलकर उसे जीवित रखना है, उनके द्वारा बतलाए मार्ग पर चलकर, उनकी शिक्षाओं, उनकी आज्ञाओ पर अमल करके, धर्म पर चलना है। एक महत्वपूर्ण खजाना पूजनीय श्री गुरुजी हम सबको देकर गए वह 'परिमल' पत्रिका रूपी सुगंध जो सर्वत्र फैली हुई है, क्योंकि 'परिमल' शब्द का अर्थ ही है "खुशबू' यानी सुगंध, परंतु इस सुगंध को सदैव बरकरार रखने के लिए तथा पूजनीय श्री गुरुजी कि प्रिय 'परिमल' पत्रिका को जीवित रखने के लिए हमने प्रयास किया है।
आजकल के इस वैज्ञानिक युग में जहां सबके पास मोबाइल फोन, इंटरनेट आदि है तो हमने 'परिमल' पत्रिका को, जो कि सन् 1982 से 2019-20 तक जितने भी अंक है, उन्हें DIGITAL करने का प्रयास किया है जो कि एक APPLICATION द्वारा आप सब को प्राप्त होगी। जिसका नाम "PARIMAL APP होगा। जो कि आप सबके लिए बिल्कुल FREE होगी, इसे आप अपने मोबाइल के GOOGLE PLAY STORE FREE DOWNLOAD पाएंगे। 'परिमल' के 1982 से 2019 तक के लगभग सारे अंक पढ़ पाएंगे, वह भी बिल्कुल FREE इसके साथ आपको APP में पूजनीय श्री गुरुजी द्वारा हिंदी अनुवाद किए गए चार मुख्य ग्रंथ भी उपलब्ध करवाए जाएंगे :-
- उद्धव गीता
- ज्ञान प्रबोध
- वत्साहरण
- रिद्धपुर वर्णन
इसके साथ अनेक हिंदी एवं मराठी स्तोत्र, आरतियां, पूजा-अवसर, पाठ, दाही आदि भी उपलब्ध रहेंगी।
ईश्वर कृपा, पूजनीय श्री गुरुजी की प्रसन्नता एवं आशीर्वाद से एक प्रयास किया है कि 'परिमल' रूपी सुगंध सब में फैली रहे तथा प. पू. प. म. श्री परिमल वाले बाबा जी का नाम एवं 'परिमल' का नाम सदैव जीवित रहे। इसमें आप सब भक्तों का स्नेह, प्रेम, संयोग, शुभ चिंतन चाहिए, इस प्रयास को सफल करने में परमात्मा इस सेवा कार्य में हमें सफलता प्रदान करें, बस यही आशा है।
इस APPLICATION को DEVELOP करना, इसका सारा कार्य आदि सब सेवा हमारे प. पू. प. म. श्री परिमल वाले बाबा जी का ही शिष्य 'केशव महाजन' (चंडीगढ़) निवासी कर रहा है। अपने स्कूल की पढ़ाई, ट्यूशन, परीक्षा आदि में व्यस्त होने के बाद भी, अपना समय निकाल कर उसने हमारी इच्छा को प्रयास को सफल करने में तन मन धन से इस परिमल APP की सेवा की है। परमात्मा इसे लंबी आयु, अच्छा स्वास्थ्य एवं शक्ति प्रदान करें तथा अपना ज्ञान और प्रेम प्रदान करें, जिससे यह आगे
इसी तरह मार्ग की. धर्म की साधु-संतों की बढ़-चढ़ कर ऐसे ही, निष्काम निस्वार्थ भाव से सेवा करता रहे, यही मेरी स्वामीजी के श्रीचरणों में प्रार्थना है।
कै. प. पू. प. म. श्री परिमल वाले बाबा जी का एक तुच्छ अंगलक सेवक एवं परमार्ग की धूल-
म सुबोध मुनि पंजाबी (विशाल श्री गीता भवन, चंडीगढ़)