हे महाराज श्री दत्त दिगंबर
हे महाराज श्री दत्त दिगंबर, सिहांचल गिरि के वासी ॥धृ॥
बद्रिकाश्रम आदि ठिकाना, गिरि गिरनार कुवल रस्ता ।
अत्री ऋषि के पुत्र कहलाए, अनसूया-जिनकी है माता ॥
त्रेतायुग अवतार लिनो जी, भक्ति मुक्ति के परदाता ।
नाना भेष करत नित क्रीड़ा, अलख निरंजन अविनाशी ॥१॥
कोल्हापूर की भिक्षा मागे,अलख जगावे प्रथम प्रहरी ।
पंचालेश्वर भोजन करके,दिन मध्यान्ह पलक ठहरी ॥
दिन मध्यान्ह पलक ठहरा ॥ माहुर गढ की निद्रा सारे,
देवल ऋषि के वचन हरी ।
पवन स्वरूप करत नित क्रीड़ा,
स्नान करत नित उठ काशी ॥२॥
अर्लक के त्रयताप निवारे, गोरख को प्रबोध किया ।
सहस्त्रार्जुन को सहस्त्र भुजा, शंकराचार्या वर पाया ॥
परशुराम को मिले दिंगबर, कावडी कोंभ नजर आया ।
को भुमीका दहन बतायो, आदिभवानी परकाशी ॥३॥
दीनदयाल कृपाघन सागर, पूर्णब्रह्मकलाधारी |
ज्ञानदियों यदुराज तारे, दत्त दिगंबर छबीन्यारी ॥
निर्गुण स्वरूप अवतार लिनो जी, भुक्तीमुक्ती के अधिकारी ।
श्यामकरण शत पांच पठायो.. २
प्रावन हों गये रूचिक ऋषि ॥४॥
हे करूणेशा प्रणाम हमेशा,
अर्ज हमारी सुन लेना ।
हम दरबारी नौकर खासे,तलब हमारी भर देना ॥
रखो मेहर की नजर हमेशा, ना जानू कब है मिलना ।