आरती प्रभु मेरे तन मन धन की
आरती प्रभु मेरे तन मन धन की,
जो प्राप्ती मुझे अपने चरण की ॥धृ॥
और तेरे से मै कुछ नही मंगना,
मै बंदेका सवाल इतना ॥१॥
गुन्हेगार मै तेरे चरण का
तेरे बिना मुझे डर न हो किसीका ॥२॥
हाथ जोड़ कहे आबाकुमरजी
गुन्हा माफ कर दो मेरी अर्जी ॥३॥
ठौर दीजिए निज चरणन में,
ताकि मन बांधू सिमरण में,
कुछ भी तो पास नहीं है मेरे,
अर्पण जो कर सकूँ मैं तेरे,
जब-जब भी मन हुआ उदास,
प्रभु जी को पाया मैनें अपने पास,
धीरज मन में है बंध जाता,
दर्शन तेरा मैं जब-जब पाता,
छूट हैं जाते सभी सहारे,
कल तक जो थे प्राणों से प्यारे।
कौन किसी का साथ निभाता,
समय पड़े तो कोई काम न आता,
तेरा एक सहारा दाता,
सारी दुनिया का झूठा नाता,
तुझे छोड़ किसे अपना बनाऊँ,
मन के अरमां किसे सुनाऊँ,
तू दाता घट-घट की जाने,
भला-बुरा सब तु ही पहचाने,
सुख का इक प्रभु द्वारा तेरा,
सकल जगत दुःखों ने घेरा,
निष्ठा मन ऐसी भर जाये,
अन्य न कोई भी द्वार सुहाये,
शीश झुका है प्रभु तेरे आगे,
कटो भव बन्धन के धागे,
ज्ञान की सदा जली रहे बाती,
यही अरदास मेरी दिनराती, श्रद्धा के मैं सुमन चढ़ाऊँ,