।। विद्वानो के विचार ||

।। विद्वानो के विचार ||
परम पूजनीय गुरुवर्य के. जयतिराज बाबा जी के द्वारा लिखी हुई श्रीमद्भगवद्गीता ( सरल हिन्दी ) आपके सन्मुख है। इसकी श्रेष्ठता के विषय में देश के बहुत से सुप्रसिद्ध तथा माननीय विद्वानों और समाचार पत्रों के सुयोग्य सम्पादकों ने अपनी सम्मतिया प्रकट की हैं। सर्व साधारण जनों की जानकारी के लिये कुछ सम्मतिया नीचे दी गई हैं। सुविख्यात अंग्रेजी समाचार पत्र ट्रिब्यून के सुयोग्य सम्पादक अपने 13 मार्च सन् 1926 के अंक में लिखते हैं:- श्री गीता जी की बढ़ती हुई सर्वप्रियता के जमाने में महात्मा श्री जयतिराज बाबा जी ने जो हिन्दी अनुवाद किया है, जिसकी एक प्रति हमारे समालोचनार्थ आई है, सबसे उत्तम है। ऐसा प्रतीत होता है मानो परमात्मा ने अनुवादक को गीता के इस अनुवाद में विशेष सहायता प्रदान की है। अनुवादक ने इस बात पर विशेष जोर दिया है कि केवल मात्र एक परमात्मा ही पूजने योग्य है। और अपने अनुवाद में महात्मा जी ने उन असूलों को विस्तार पूर्वक वर्णन किया है, जो मुक्ति साधन के निमित्य अत्यन्त आवश्यक हैं (जिनकी साधना करने पर ही परमात्मा मुक्ति देते हैं। इस गीता का उर्दू अनुवाद अब से दो वर्ष पहिले प्रकाशित हुआ था और जनता ने उसे बहुत अपनाया था और कसरत से प्रेमियों ने भारी संख्या में कापियां खरीद कर विद्यार्थियों में मुफ्त बांट दी थीं वर्तमान अनुवाद की शैली ऐसी स्पष्ट है कि एक साधारण बुद्धि का आदमी भी इसे आसानी से समझ सकता है एतदर्थ इस पुस्तक को बालकों तथा बालिकाओं के हाथों में देने से बड़ा लाभ होगा। श्रीमान् पं. श्री सन्तराज जी शास्त्री मुख्याध्यापक श्रीकृष्ण संस्कृत महाविद्यालय (हरिपुर हज़ारा ) से 15 अक्तूबर सन् 1926 के पत्र में लिखते हैं:- यद्यपि आज तक गीता पर बहुत सी टीकाएं लिखी जा चुकी हैं, फिर भी महात्मा श्री जयतिराज बाबा जी की सरल हिन्दी टीका सर्वोत्तम है । पहिली टीकाएं चूंकि कठिन शब्दों में है, इसलिये प्रत्येक जन उनसे लाभ नहीं उठा सकता था। इस गीता से वह कमी दूर हो गई है। यह अनुवाद करके आपने हिन्दी जानने वालों पर जो उपकार किया है, वह पूर्णतया अकथनीय है। किताब व छपाई सच प्रकार से उत्तम होने पर भी कीमत कम रख कर आपने विशाल हृदय का प्रमाण दिया है। हम आपको इसके लिये बहुत 2 धन्यवाद देकर इस पुस्तक का हृदयगत भाव से स्वागत करते हैं। ब्रह्मविद्या शास्त्र व अनन्य भक्ति ग्रन्थों के लेखक महन्त पं. श्री मुकुन्दराज जी आराध्ये अमृतसर से 1 नवम्बर सन् 1926 के पत्र में लिखते हैं- सम्मान के योग्य महात्मा श्री जयतिराज बाबा जी आप ने श्रीमद्भगवद्गीता सरल भाषा में प्रकाशित करके हिन्दी जनता पर जो उपकार किया है, उसका वर्णन नहीं हो सकता। देवता भक्ति के भ्रम जालों को तिलांजली देकर भगवान् की अनन्य भक्ति करना ही मनुष्य जन्म का अन्तिम उद्देश्य है, इसका बहुत ही सुन्दर शब्दों में वर्णन किया है और कर्मयोग की असली नह को साफ करते हुए ज्ञानी और अज्ञानी गुरु की पहचान का भी क्या अति उत्तम फोटो खेथा है।
1) भावों की गंभीरता । 2) शब्दों की मधुरता ।
3) परीक्षित सिद्धान्तों की पोषकता की विशेषता । 4) निबंध की गूड़ता और सरलता आदि सब गुणों से पूर्ण इस पुस्तक को पढ़ते ही मन मोहित हो जाता है। प्रत्येक अध्याय के अन्त में प्राचीन दोहे, आरती, कवितादि तो स्वर्ण में सुगंध का काम दे रहे हैं। पुस्तक का आकार तो और भी गजब ढा रहा है। हम आशा करते हैं कि हिन्दी जनता इस पुस्तक को पढकर अपना कर्तव्य पालन करेगी। श्रीमान् पं. प्रभाकर जी शास्त्री होशियारपुर से 12 दिसम्बर सन् 1926 के पत्र में लिखते हैं:- श्रीमान् महानुभाव कुल कमल दिवाकर जी प्रणाम के अनन्तर निवेदन है कि श्रीमद्भगवङ्गीता सरल हिन्दी टीका आपकी बनाई हुई हमारी नज़र से गुजरी, उसके पाठ से मुझे असीम प्रसन्नता प्राप्त हुई है। क्योंकि उसमें आपने जो अनन्य भक्ति का गहरा सिद्धान्त सरल भाषा में समझाया है, उससे यह पुस्तक हिन्दी जानने वाले क्या स्त्री, क्या पुरुष सब के लिये अनन्य भक्ति का मार्ग प्रदर्शन करने के निमित्त बहुत लाभदायक है। इसमें जो आपने प्रत्येक अध्याय के अन्त में आरती, दोहे और कवित्त लिखे हैं, उन्होंने तो इस पुस्तक को बड़े काम की चीज बना दिया है। हम आशा करते हैं कि यह पुस्तक अपनी विशेषताओं के विचार से थोडं ही दिनों में लोकप्रियता प्राप्त करेगी। महन्त श्रीमान् पं. बालकृष्ण जी शास्त्री, संस्थान देवदेवेश्वर माहूर (निज़ाम स्टेट) से 12 दिसम्बर सन् 1926 के पत्र में उल्लेख करते हैं:- श्रीमान् महात्मकुलावंतस महात्मा जी ! नमस्कार । आपकी भेजी हुई श्रीमद्भगवद्गीता सरल हिन्दी [मिली। आहा! आहा ! आज कपिला पष्टी योग है। मैं ही क्या सब हिन्दी जानने वाले इस अवसर की प्रतीक्षा कर रहे थे। यह पुस्तक अपने ढंग की निराली है। इसमें आनन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्र भगवान् जी के उपदेशों को अतुल रूप में दर्ज किया गया है। आज हिन्दी भाषा जानने वाले मोक्ष अभिलाषी सज्जनों की आशाएं पूरी हो गई। मैं बल पूर्वक कहता हूँ कि जीवन मुक्त प्रदान करने वाले भगवान् के उपदेशों का प्रवाह आज ही सबसे पहिले प्रकट हुआ है। मुझे आशा है कि- अपूर्व लाभ से हिन्दी संसार अवश्यमेव लाभ उठायेगा।