श्री जयकृष्णी प्रार्थना
श्री जयकृष्णी प्रार्थना
श्रीचक्रधरार्पणमस्तु
चरण कमल प्रभु आपके, पार उतारन हार ।
सुन्दर कटि वाले प्रभु, कर मेरा उद्धार ॥
सब वेदों के सार को स्वामी,
धारत हृदय में प्रभु अन्तर्यामी ।
नेत्रों से त्रिताप मिटावें,
गौरवर्ण सब के मन भावें ॥
हे श्रीचक्रपाणि पापारी,
नमस्कार मेरी सौ-सौ बारी ।
तुम सब उसको शीश झुकाओ,
मन मन्दिर में उसे बिठाओ ॥
हे श्रीकृष्ण सकल दुःख हरता,
दीनानाथ चराचर करता ।
मैं पापी दर आपके आया,
कर पैरों से पाप कमाया ॥
बहुत पाप वाणी संग कीने,
आँख, कान, पापों को दीने ।
काया से कई पाप कमाये,
मन से पाप किये मन भाये ॥
कर्मों से पैदा हुए, मैं कीने कई पाप ।
जान बूझ लाखों किये,
करूं मैं पश्चाताप ।
करो प्रभो बक्षो मेरे ।
न जाने हुए पाप घनेरे,
कृपा हे मायापति,
हे सर्वेश्वर, करूणा के सागर परमेश्वर ।।
हे नंदनंदन हे कंसारी,
जय तेरी हो हे पापारी ।
मैं मतिमंद भ्रष्ट गुण हीना,
क्रूर नष्ट निर्लज मलीना ॥
अति मूर्ख कंजूस कठोरा,
मैं कृतघ्न अपवित्र हूं चोरा ।
खानपान को नित अपनाऊँ,
हिंसा में मन सदा लगाऊँ ॥
आशा साथ बंधे मन वाला,
बुरा कर्म सब मैंने सम्भाला ।
दोषों का सागर हूँ भारी,
नीच मंद प्रभु नीच विहारी ।
यदुपति भूपति हे प्रभु दीनदयाल ।
रक्षा कर करुणानिधे,
हे श्रीकृष्ण कृपाल ॥
करुणाकर प्रभु हाथ बढ़ाओ,
मेरी रक्षा करो बचाओ ।
प्रभु मैं भक्ति से हीना,
ज्ञान वैराग्य न मैंने लीना ।
कोई गुण निकट न मेरे आया,
पापों में नित मन को लाया ।
दोषों का मैं सागर स्वामी,
मुझे बचाओ अन्तर्यामी ।
मैं पापी नित पाप कमांवां,
पापात्मा जगमहिं सदावां ।
मैंने जन्म पाप में पाया,
पाप कमावन जग में आया ।
फिर भी आपका दास कहाऊँ,
तज तब द्वार मैं किस दर जाऊँ ।
कृपा करो प्रभु मुझे बचाओ,
शरणागत हूँ शरण लगाओ ।
शुद्ध बुद्धि देवो मुझे,
बुरी करूं नहीं काज ।
पिछले अवगुण बक्ष दो,
हे प्रभु नंद कुमार ॥
पर-धन में मन जाये न मेरा,
जेकर होय अनुग्रह तेरा ।
पाप बुद्धि प्रभु मेरी हरनी,
कृपा आपने मुझ पर करनी ॥
पर-नारी मैं रत नहीं होवां,
पर - धन पान लिये नहीं रोवां ।
चोरी कर्म नहीं अपनावां,
निंदा के मैं निकट न जांवां ।
यह प्रभु मुझको भिक्षा देवो,
सत्य बोलना मुझे सिखाओ ।
सब प्राणी मैं सुखी निहारूं,
हर कोई खुशी देख मन ठारूं ।
दुःख क्लेश नजर न आवे,
सुखी चराचर सब दरसावें ।
मिथ्या कपट झूठ मिट जावें,
सकल लोक तेरा यश गावें ।
यह विनती गोपाल की,
दीन बंधु गोपाल ॥
सबके रक्षक आप हो, हे प्रभु दीन दयाल - २ ॥
॥ इति श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥