प्रायश्चित
प्रभो मैं अमित दोषों से भरा हूँ ।
नजर नीचे कर, तेरे आगे खड़ा हूँ
जो पूंजी थी संचित, वो आया लुटाकर ।
क्षमा कर प्रभो मेरे, मुझको क्षमा कर ॥ १ ॥
सदा क्रूर कर्म ही, करता मैं आया ।
कटुक वाणी से सबका, दिल ही दुखाया ।।
विकारों की थाती, मैं लाया कमाकर ।
क्षमा कर प्रभो मेरे, मुझको क्षमा कर ॥२॥
सदा लालसा मान की, है सताती ।
किसी की भली बात, मन को न भाती ॥
लता मैं कुकर्मों की आया बढ़ाकर ।
क्षमा कर प्रभो मेरे, मुझको क्षमा कर || ३ |
क्रोधी मैं ऐसा, सदा तम-तमाऊँ ।
स्वारथ के वश ही हो, धर्म निभाऊँ ॥
निंदक कुटिल खुद को, लाया बनाकर ।
क्षमा कर प्रभो मेरे, मुझको क्षमा कर ||४||
सदा क्षोभ संतों का, अर्जित किया है।
इसी वास्ते रोष, तेरा लिया है।
गिनती नहीं पाप, इतने बदन पर ।
क्षमा कर प्रभो मेरे, मुझको क्षमा कर ॥५॥
छुड़ाऐ न छूटे, जगत मोह ऐसा ।
सदा छिद्र दिखें, मैं निंदक हूँ ऐसा ॥
अंतस् का धीरज, मैं आया गंवाकर ।
क्षमाकर प्रभो मेरे, मुझको क्षमा कर || ६ ||
तेरे आगे ये मस्तक, मैं कैसे उठाऊँ ।
नजर ऊंची कर कैसे, मैं दृष्टि मिलाऊँ ॥
उदार है तूं, दोष मेरे भुलाकर ।
क्षमा कर प्रभो मेरे, मुझको क्षमा कर ॥७॥
दण्डित करो या, चरणों से लगाओ ।
अपराध मेरे प्रभो, भूल जाओ ॥
अरजी यही दर पे तेरे, दयाकर ।
क्षमाकर प्रभो मेरे, मुझको क्षमाकर ||८|| \
है ये झुका मस्तक, झुका ही रहेगा ।
करोगे क्षमा जब, तभी ये उठेगा ||
कभी हम गरीबों की, भी सुनाकर ।
क्षमा कर प्रभो मेरे, मुझको क्षमा कर ||९||
सत् पथ पे मुझको है, तुमने चलाना ।
पतित है जो जीवन, तुम्हीं ने उठाना ॥
धड़कन में सांसों में, तूं ही रमाकर ।
क्षमा कर प्रभो मेरे, मुझको क्षमा कर ॥ १० ॥